स्वदेश (Swadesh) – पाठ परिचय

स्वदेश’ कविता हमारी मल्हार पाठ्य-पुस्तक के प्रथम पाठ के रूप में सम्मिलित है। इसके रचनाकार सुप्रसिद्ध कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ हैं। इस रचना के माध्यम से कवि ने देशभक्तिआत्मसम्मानसामाजिक दायित्व और त्याग की भावना को जागृत करने का प्रयास किया है।
कवि का स्पष्ट मत है कि जिस व्यक्ति के मन में अपने देश के प्रति सच्चा प्रेम नहीं होतावह वास्तव में संवेदनहीन है। कविता यह संदेश देती है कि देश के प्रति प्रेमकर्तव्यनिष्ठा और साहस ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

 

 

स्वदेश पाठ सार (Summary)

कवि इस कविता में बताते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अपने देश के लिए प्रेम नहीं हैउसका हृदय पत्थर के समान कठोर और निष्प्राण है। ऐसा व्यक्ति जीवन के वास्तविक आनंद और उद्देश्य से वंचित रहता है। यदि किसी के जीवन में उत्साहऊर्जा और देशभक्ति का भाव नहीं हैतो उसका जीवन निरर्थक माना जाएगा।
कवि आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति समाज और समय के साथ तालमेल नहीं बैठा पातावह समाज में अपना स्थान नहीं बना सकता। बिना साहस के कोई भी व्यक्ति बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर सकताइसलिए भयभीत होकर जीवन जीना व्यर्थ है।
अगले भाग में कवि यह स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति अपने समाज या समुदाय के लिए कुछ नहीं कर पायावह स्वयं भी उन्नति नहीं कर सकता। जो लोग केवल अपने हित के लिए जीते हैंवे न समाज के लिए उपयोगी होते हैं और न देश के लिए। जिस हृदय में संवेदनाएँ नहीं हैंवह भी पत्थर के समान ही है।
इसके बाद कवि भारतभूमि की महानता और सुंदरता का वर्णन करते हैं। यह वही भूमि है जहाँ हम जन्मेपले-बढ़े और जहाँ से हमें जीवन के सभी आवश्यक साधन प्राप्त हुए। यही हमारी संस्कृतिपरंपराज्ञान और गौरवशाली इतिहास की धरोहर है। इस देश की मिट्टी में आध्यात्मिक शक्ति और अपार समृद्धि विद्यमान हैजिसे विश्वभर के विद्वान भी स्वीकार करते हैं। ऐसी महान भूमि के प्रति प्रेम न होना एक गंभीर कमी है।
अंत में कवि कहते हैं कि मृत्यु एक दिन सभी को आनी ही हैलेकिन यदि हम अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर देंतो हमारी मृत्यु भी अमर हो जाती है। जैसे दीपक पर जलकर परवाना अमर हो जाता हैवैसे ही देश के लिए बलिदान देने वाले लोग इतिहास में अमिट स्थान प्राप्त करते हैं। हमारे पास साहसशक्ति और साधन हैंइसलिए हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए देश के लिए जीना और आवश्यकता पड़े तो मरना भी चाहिए।
इस प्रकार यह कविता देशप्रेम की भावना से परिपूर्ण है और पाठकों को प्रेरित करती है कि वे अपने देश के प्रति समर्पित रहें।


स्वदेश पाठ व्याख्या (Explanation)


🔹 काव्य खंड 1

वह हृदय नहीं है पत्थर है,

जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

जो जीवित जोश जगा न सका,

उस जीवन में कुछ सार नहीं।

जो चल न सका संसार-संग,

उसका होता संसार नहीं॥

जिसने साहस को छोड़ दिया,

वह पहुँच सकेगा पार नहीं।


    • हृदय – दिलमन
    • स्वदेश – अपना देश
    • सार – महत्वमूल्य
    • संसार-संग – दुनिया के साथसमाज के साथ
    • साहस – हिम्मतवीरता
    • पार – लक्ष्य तक पहुँचनासफलता प्राप्त करना

 

भावार्थ :

कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हृदय में अपने देश के प्रति प्रेम नहीं हैवह वास्तव में पत्थर के समान है। ऐसा जीवन जिसमें उत्साह और देशभक्ति का भाव नहीं होउसका कोई महत्व नहीं होता। जो व्यक्ति समाज के साथ चलना नहीं सीखतावह समाज में अपनी पहचान नहीं बना सकता। जो लोग साहस छोड़ देते हैंवे अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाते।


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🔹 काव्य खंड 2

जिससे न जाति-उद्धार हुआ,

होगा उसका उद्धार नहीं॥

जो भरा नहीं है भावों से,

बहती जिसमें रस-धार नहीं।

वह हृदय नहीं है पत्थर है,

जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥


  जाति – समाजसमुदाय

  उद्धार – भलाईउन्नतिसुधार

  भाव – भावनाएँसंवेदनाएँ

  रस-धार – प्रेम और भावनाओं की धारा


भावार्थ :

कवि बताते हैं कि जो व्यक्ति अपने समाज का भला नहीं कर सकताउसका स्वयं का विकास भी संभव नहीं है। यदि किसी के हृदय में प्रेमसंवेदना और करुणा का अभाव हैतो उसका जीवन व्यर्थ है। जिस मन में देश के प्रति प्रेम नहीं हैवह हृदय कहलाने योग्य नहींबल्कि पत्थर के समान है।


🔹 काव्य खंड 3

जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,

पाया जिसमें दाना-पानी।

हैं माता-पिता बंधु जिसमें,

हम हैं जिसके राजा-रानी॥

जिसने कि खजाने खोले हैं,

नव रत्न दिये हैं लासानी।

जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,

जिस पर है दुनिया दीवानी॥


  दाना-पानी – भोजन और पानी (जीवन के साधन)

  बंधु – भाई-बंधुरिश्तेदार

  खजाने – धन-संपत्तिबहुमूल्य चीजें

  नव रत्न – अनमोल चीजें/ज्ञान

  लासानी – बेजोड़जिसकी तुलना न हो

  ज्ञानी – विद्वान व्यक्ति


भावार्थ :

कवि अपनी जन्मभूमि की महिमा का वर्णन करते हैं। यह वही भूमि है जहाँ हमने जन्म लियाजीवनयापन के साधन पाए और अपने परिवार के साथ जीवन बिताया। यही देश हमें समृद्ध संस्कृतिज्ञान और अनमोल धरोहर प्रदान करता है। इस भूमि की महानता ऐसी है कि विद्वान भी इसकी प्रशंसा करते नहीं थकते और पूरी दुनिया इसके प्रति आकर्षित रहती है।


🔹 काव्य खंड 4

उस पर है नहीं पसीजा जो,

क्या है वह भू का भार नहीं।

निश्चित है निस्संशय निश्चित,

है जान एक दिन जाने को।

है काल-दीप जलता हरदम,

जल जाना है परवानों को॥

सब कुछ है अपने हाथों में,

क्या तोप नहीं तलवार नहीं।

वह हृदय नहीं हैपत्थर है,

जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥


  पसीजा – दया आनामन पिघलना

  भू – धरतीपृथ्वी

  निश्चित – तयपक्का

  निस्संशय – बिना किसी संदेह के

  काल-दीप – समय/मृत्यु का प्रतीक दीपक

  हरदम – हमेशा

  परवाना – दीपक पर जान देने वाला कीड़ा (प्रेम/बलिदान का प्रतीक)

  तोप – बड़ा युद्ध हथियार

  तलवार – हथियार (लड़ाई के लिए)


भावार्थ :

कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हृदय में देश के प्रति प्रेम और करुणा नहीं हैवह इस धरती पर बोझ के समान है। मृत्यु निश्चित हैइसलिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए हमें देश की सेवा करनी चाहिए। जैसे परवाना दीपक में जलकर अमर हो जाता हैवैसे ही देश के लिए बलिदान देने वाले लोग अमर हो जाते हैं। हमारे पास शक्तिसाहस और साधन सब कुछ हैइसलिए हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए देश के लिए समर्पित रहना चाहिए।


निष्कर्ष (Conclusion)

यह कविता हमें सिखाती है कि एक सच्चा नागरिक वही होता है जो अपने देश के प्रति प्रेम रखता है और उसके विकास के लिए कार्य करता है। देशभक्ति केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिएबल्कि उसे कर्म में भी दिखाई देना चाहिए।

 

 

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